Posts

रेत समाधि को बुकर पुरस्कार : लेखकों के लिए हिंदी राष्ट्रीयता के कुएं से निकलने का अलार्म

Image
गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' के अंग्रेज़ी तर्जुमे 'Tomb of Sand' को बुकर पुरस्कार मिलने पर हिंदी भाषा और अंग्रेज़ी भाषा, दोनों मुबारक की हकदार हैं। यह एक अद्भुत जुगलबंदी है, कि हिंदी में सोचा-लिखा गया उपन्यास, अंग्रेज़ी पाठकों और ज्यूरी पर भी उतना ही पुर-असर रहा, जितना मूल भाषा में। हिंदी भाषा का गौरव तो बढ़ा ही है लेकिन अब समय आ गया है कि लेखक, हिंदी के साथ कम से कम दो और भाषाओं में लिखना शुरू करें। झुंपा लाहिड़ी का हालिया उपन्यास Whereabouts उन्होंने पहले इटालियन भाषा में ही सोचा, लिखा और फिर उसका अनुवाद अंग्रेज़ी में किया। ऐसा करके हम भाषा, संस्कृति और स्थानीयता के वाटरटाइट खांचों से भी निकल पाते हैं। मशहूर लेखक James Baldwin खुद को commuter(यात्री) कहते हैं क्योंकि अपने लेखन से वे संस्कृतियों, शहरों, भाषाओं के बीच आवागमन कर पाते हैं। अरुंधति रॉय को बुकर मिलने के बाद एक पाठक उनसे पूछता है कि क्या किसी लेखक ने कभी एक मास्टरपीस अपनी मातृभाषा के अलावा किसी और भाषा में लिखा है? अरुंधति कहती हैं नाबोकोव ने, लेकिन असल में Algorithm ही है जो एक लेखक को उ...

एंग्लो-सिख संबंध: इतिहास के ग्रे गलियारों से

Image
अक्सर हमारा बौद्धिक-वर्ग इतिहास में अंग्रेज़ों के साथ रहे गुलाम भारतीय समूहों के संबंधों पर एकमुश्त ब्लैक एंड व्हाइट रुख अख्तियार कर उन सभी को नैतिक कटघरे में खड़ा कर देता है, जिन्होंने उस समय के मुताबिक एक व्यवहारिक पक्ष चुना। 17वीं शताब्दी से लेकर 1947 आते आते सियासी और समाजी हालात कई रूप में बदले और भारतीय प्रजा के, बतौर अधीनस्त, रुख में परिवर्तन देखने को मिला। ऐसा ही एक भारतीय समूह था सिखों का, जिनके अंग्रेज़ी हुकूमत के साथ संबंधों को हम तफ्सील से साक्ष्यों सहित मुड़कर देखेंगे।   यूं तो सन 1758 में सिखों के दल खालसा ने जस्सा सिंह अहलूवालिया की अगुवाई में मुग़ल गवर्नर अदीना बेग और मराठों के साथ हाथ मिलाकर सरहिंद पर चढ़ाई भी की थी।¹ लेकिन एंग्लो-सिख संबंधों पर केंद्रित रहकर उन ऐतिहासिक पड़ावों का ज़िक्र करना सही होगा, जिनसे यह संबंध और मज़बूत हुए। याद रहे, एंग्लो-सिख दोस्ती परस्पर एक दूसरे की सीमा के सम्मान की शर्त पर कायम रही।  1771 में सिखों की भंगी मिस्ल के मजबूत सरदार, झंडा सिंह ढिल्लों ने अंग्रेज़ जनरल रॉबर्ट बार्कर को बाकायदा खत लिखकर यह इसरार किया कि ...

𝐓𝐡𝐞 𝐓𝐢𝐭𝐥𝐞 𝐒𝐮𝐢𝐭 𝐨𝐟 𝐓𝐚𝐣 𝐌𝐚𝐡𝐚𝐥 : सियासी हक़-तर्क की तफ़्तीश

Image
राजकुमारी दीया कुमारी के ताजमहल पर दिए बयान के बहाने जयपुर राजघराने और मिल्कियत के दावे का मज़ाक तो खूब बना लेकिन राजकुमारी का बयान अधपका ज़रूर कहा जा सकता है पर 'ज़मीन' पर रही जयपुर राजघराने की मिल्कियत का दावा कतई खोखला नहीं है। इसका सबूत है नीचे दिए रेफरेंस, जो साबित करते हैं कि ताजमहल को बनाने के लिए शाहजहां ने 'ज़मीन' आमेर (जयपुर) के राजघराने से ही ली थी। (ध्यान रहे, इनमें कहीं ताजमहल के 'तेजो महालय' होने की बात नहीं मिलती है।) • 𝐒𝐭𝐮𝐚𝐫𝐭 𝐂𝐚𝐫𝐲 𝐖𝐞𝐥𝐜𝐡 एक मशहूर अमरीकी क्यूरेटर और स्कॉलर रहे, जिनकी 1985 में छपी किताब 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚: 𝐀𝐫𝐭 𝐚𝐧𝐝 𝐂𝐮𝐥𝐭𝐮𝐫𝐞, 𝟏𝟑𝟎𝟎-𝟏𝟗𝟎𝟎 में वो लिखते हैं: "On the death of his (Prince Khurram) favorite wife, Mumtaz-Mahal, land that had belonged to Raja Man Singh was acquired as the site for her tomb-the Taj Mahal." • 𝐆𝐢𝐥𝐞𝐬 𝐓𝐢𝐥𝐥𝐨𝐭𝐬𝐨𝐧 एक प्रख्यात इतिहासकार हैं और भारतीय इतिहास & स्थापत्य कला के प्रोफेसर हैं। इनकी 2006 में आई किताब 𝐉𝐚𝐢𝐩𝐮𝐫 𝐍𝐚𝐦𝐚: 𝐓𝐚𝐥𝐞𝐬 𝐅𝐫𝐨𝐦...

ऐश ट्रे: ठंडी राख से भी हल्की दुनिया के अफसाने

Image
है दर रिज़वी की लिखी और मैनड्रेक पब्लिकेशंस से आई किताब ' ऐश ट्रे ' को एक ही घूंट में पढ़कर ख़त्म किया है और सोच रही हूं कि बतौर लेखक, हैदर रिज़वी कितने हस्सास हैं, इसकी तस्दीक उनके लेखन ने कर दी है। 'ऐश ट्रे' की संरचना जॉनर या शैली की नियमित दीवारें तोड़ती है। कविता कहीं कहानी का इंजन बन जाती है, कहीं कहानी ही कविता को किनारे लाकर छोड़ जाती है। किताब आम आदमी की जुबान में लिखी गई है और व्याकरण या शब्दावली इतनी भारी भरकम कतई नहीं हैं कि कहानी के वजूद पर बोझ डाले।  बतौर अफ़सानानिगार, हैदर रिज़वी पॉलिटिकली करेक्ट होने के फेर में नहीं पड़ते, बल्कि बड़ी बेबाकी से अपनी बात लिखते हैं। आदर्शवाद के मखमली बयानों से परे यथार्थ की खुरदरी ज़मीन पर खड़ी कहानियां मंटो की याद भी दिलाती हैं। हैदर स्त्री-मन की पेचीदा गलियों से लाकर कहानियां हूबहू सामने रखते हैं, एक स्त्री के बयान की शक्ल में। दंगों की हूक से गूंजती कहानियां एक सिहरन पैदा कर जाती हैं, गोया आप एक चश्मदीद की तरह मौके पर खड़े होकर सब देख रहे हों।  अफसाने तो बाद में आते हैं, लेकिन बंबई के अनहद आकाश में चुग्गे की त...

प्रील्यूड टू ए रायट : हमारे समय का हल्फनामा

Image
ऐनी ज़ैदी का उपन्यास 'प्रील्यूड टू ए रायट ' हमारे ही इस खतरनाक समय का हलफनामा है, जहां नफरतें, बेल-बूटियों की तरह हमारे घर-आंगन तक बढ़ आई हैं और ज़हरीला धुआं पूरे समाज के फेफड़ों में भर गया है, किसी भी समय एक शहर को आग में झोंका जा सकता है और सब अपनी-अपनी बारी के इंतज़ार में हैं। यह नफ़रत कभी प्रवासी मजदूरों तो कभी गैर धर्म के लोगों तो कभी औरतों के लिए उमड़ती-घुमड़ती मिल जाती है।  सांप्रदायिक और हिंसक होते आस-पड़ोसियों से डर कर छटपटाते किरदारों की आवाज़ें इस उपन्यास में साफ़ सुन पाएंगे। 'प्रील्यूड टू ए रायट' को पढ़ते हुए प्रियम्वद के लिखे उपन्यास ' वे वहां कैद हैं' की याद आई। स्टोरीटैलिंग का अंदाज़ रूटीन लेखन से अलग है। आप भी पढ़िए...

किराएदारी : अस्थाई पते वालों की दुनिया

Image
कभी टपकती हुई छत से मजबूर होकर, कभी लड़ाके पड़ोसियों और चौकीदारों से परेशां होकर, कभी बढ़ते किराए तो कभी मकानमालिकों की शक़ी इन्क्वारियों से दुखी होकर ही एक शहरी किराएदार अपना मकान छोड़ता है और नए मकान को ढूंढने की कवायद में ऐसे-ऐसे तजुर्बों से गुज़रता है कि ऐसा एक लेख लिखने की ज़रूरत उसे महसूस हो जाती है।  यूँ तो घर वह होता है जहाँ रहते हैं हमारे घरवाले, जहाँ होता है आँगन और जहाँ जुड़ी होती हैं बचपन की यादों वाली गहरी जड़ें। शहरी मकान तो बस हुआ करते हैं डेरा , जो कामचलाऊ होता है, जो रैन-बसेरा से थोड़ा ज़्यादा स्थाई और धर्मशाला से थोड़ा कम सार्वजानिक होता है, लेकिन ज़रूरत के सब ज़रूरी माल-ओ-सामान यहाँ जुटाए जाते हैं ताकि घर का मिनिमलिस्ट रेप्लिका जैसा बन जाए, बिना किसी मुसलसल ' पैरेंटल गाइडेंस '' के।  ज़्यादातर बैचलर और पढ़ने लिखने वालों के घर बिखरे हुए, किताबों से अटे हुए, धूल से सने हुए, रंग बिरंगे पोस्टरों से भरे हुए मिलते हैं जिनमें जूठे बर्तनों और मैले कपड़ों के छोटे-मोटे अरावली और शिवालिक मिल जाएंगे। जवान उत्सुकताओं के सबूत सिगरेट के खाली पैकेट और बियर की...

सूफ़ी फाइलें | अफ़ग़ानी सरज़मीं पर सूफ़ी निशानियाँ

Image
  ता लिबान ने पिछले दिनों अफगानिस्तान के ' हेरात ' शहर पर कब्ज़ा कर लिया और पिछले कुछ दिनों में औरतों को लेकर कई सख़्त आदेश भी जारी किए हैं। तालिबान की वापसी के साथ अफगानिस्तान में औरतों के भविष्य पर एक सवालिया निशान लग गया है लेकिन इतिहास में इस इलाके की पहचान ही औरतों की बनाई इमारतों से रही है।  तै मूर वंश के शासन के दौरान ' गौहर शाद ' नाम की सम्राज्ञी ने सामाजिक नियमों के खिलाफ जाकर भी दो जुमा-मस्जिदों और मदरसे का निर्माण करवाया, जिनमें से एक, ' गौहर शाद मुसल्ला ', हेरात शहर की पहचान रहा है। यह मुसल्ला परिसर उस समय की सामाजिक गतिविधियों का केंद्र रहा जहां बौद्धिकों का जमघट लगता, मुशायरे हुआ करते और कई करतब भी दिखाई जाते थे। यहां बनाई गई 20 मीनारों में से 5 ही बची हैं लेकिन उस समय एक संपन्न महिला द्वारा अपनी निजी संपत्ति से ऐसे भव्य निर्माण करवाना अद्भुत था।  गौ हर शाद ने खुरासान के मशहूर सूफी शायर 'अहमद-ए-जाम' के नाम भी कई रकबा ज़मीन की, ताकि सूफियों की संगत उनके शासन को मिली रहे। तैमूर की बेगम ' तुमन आका ' ने भी कुसुविया नामक जगह पर एक खानकाह...

सूफी फाइलें | तुरिया तुरिया जा फरीदा

Image
". . उ ठ फरीदा सुत्तेया, दुनिया वेखन्न जा.. जे कोई मिल जाए बक्शेया, तू वी बक्शेया जा.." 'पंज-पीरों' और 'चार-यार' में से एक__सूफी पीर और शायर बाबा फरीद 'गंजशकर' का उर्स इस वक्त पाकपत्तन में उनकी मज़ार पर मनाया जा रहा है। कहते हैं बाबा फरीद पंजाबी भाषा के पहले शायर हुए और उनके लिखे 134 श्लोक/दोहे 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी शामिल किए गए। बाबा फरीद महरौली वाले ख्वाजा बख़्तियार काकी के मुरीद थे और उन्हीं की हिदायत पर बाबा फरीद ने 18 साल अलग-अलग जगहों का दौरा किया जैसे गज़नी, बगदाद, येरूशलम,सीरिया, मक्का और मदीना। बाबा फरीद से मुतासिर होकर पश्चिमी पंजाब के सियाल, खोखर, भट्टी और टिवाना जैसे कई जट्ट कबीलों ने इस्लाम भी कबूला। अपने जीते जी तो बाबा फरीद ने सियासतदानों से एक दूरी बनाए रखी लेकिन उनके उत्तराधिकारी 'दीवानों' ने दिल्ली सल्तनत और तुगलक शासकों के साथ गहरे ताल्लुक बनाए। बाबा फरीद की दरगाह पर तैमूर लंग से लेकर अकबर तक ने हाज़िरी दी। माना जाता है कि इनकी मज़ार पर मौजूद ' बहिश्ती दरवाज़े' से गुजरने वालों को जन्नत नसीब होती है मगर ...

सूफ़ी फाइलें | कश्मीरी कला-संस्कृति पर सूफी छाप

Image
कल कश्मीर में शाह-ए-हमदान का 656वां उर्स मनाया गया, वही शाह-ए-हमदान , जिनकी याद में झेलम किनारे बनाई गई खानकाह-ए-मौला श्रीनगर के डाउनटाउन की पहचान है। शाह-ए-हमदान यानी ' मीर सैय्यद अली हमदानी' एक सूफी पीर और शायर हुए, जो ईरान से 15वीं शताब्दी में कश्मीर आए 700 सय्यदों (missionaries) के साथ और कश्मीर में सूफीवाद (के माध्यम से इस्लाम) की बुनियाद रखी। इनके प्रभाव में तकरीबन 37000 लोगों ने इस्लाम अपनाया, जिसका ज़िक्र 'रेशीनामा' में मिलता है और इन्होंने एकेश्वरवाद पर ज़ोर दिया! सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं, बल्कि शाह-ए-हमदान ने कश्मीर को सिखाए ऐसे फ़न, जिनसे आज कश्मीर दुनिया भर में मकबूल है, जैसे पशमीना साज़ी, सोज़नकारी, पेपर मशी, कालीन बुनना, सामोवर बनाना वगैरह। शॉल बुनने की कला भी उन्हीं की देन है कश्मीरी बुनकरों को। कहा जाता है कि कश्मीरी पहनावे पर पहले जो स्थानीय प्रभाव था, उसे भी बदलने और उसकी जगह चोगानुमा ईरानी कमीज़ पहनने का सिलसिला भी इन्हीं की सरपरस्ती में शुरू किया गया। अल्लामा इकबाल ने भी माना कि शाह हमदान की सिखाई अद्भुत कला और शिल्प ने कश्मीर...

कुछ तो लोग कहेंगे

Image
अ गस्त की उमस भरी दोपहरों में कीचड़ वाली गलियों में मकान तलाशते हुए बार-बार आयशा को लगता कि बंटवारे के वक्त भी ऐसी ही उमस भरी गर्मी में लोग अपना घर-बार छोड़ कैसे अंजान देस की तरफ चल दिए होंगे पैदल ही। कितने ही मकान देखे थे आयशा और अबरार ने मिलकर, कोई दड़बानुमा घुप्प अंधेरी कोठरी जैसा तो कोई मकानमालिक के सर्वेंट क्वार्टर जैसा। एक भी मकान मन-माफिक नहीं मिला था अभी तक और अब तो हौसला भी टूटने लगा था। मगर बरसाती की टपकती छत के नीचे कैसे बाकि भादों काटते, इसलिए नया घर तो ज़रूरी था। किस्मत से एक मकान दिखाया डीलर ने, जिसमें कदम रखते ही आयशा को लगा कि तलाश यहीं खत्म हुई। बड़ी रोशनीदार खिड़कियाँ, ऊंची छतें, सफेद दीवारें, लंबी बालकनी और लिफ्ट, सब कुछ अपनी जगह सही था। आयशा और अबरार ने इन दूसरे को देखा और बिना कहे ही समझ गए कि किराया बेशक थोड़ा ज़्यादा है, मगर अब तो यहीं रहा जाएगा।  और देखते ही देखते दोनों ने इस मकान का कोना-कोना बड़े प्यार से सजाना शुरू किया। अबरार ने किताबों के लिए अलग कमरा रखा, जहां इतिहास, सियासत और कहानियों की नई-पुरानी किताबें बड़ी ही तरतीब से सजाई। उधर आयशा न...