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वैष्णव साम्राज्य का नव उदय

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आधुनिक भारत के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक ऐसा सुव्यवस्थित परिवर्तन चल रहा है जिसका उद्देश्य देश के बुनियादी बहुलतावाद को एकाश्मीय आध्यात्मिक व्यवस्था में ढालना है। अयोध्या के नए तराशे गए पत्थरों के पैनलों से लेकर बनारस की बदलती प्रशासनिक नीतियों तक, सनातन धर्म की विविध परंपराओं को लगातार समरूपीकरण किया जा रहा है। वर्तमान में जिसे एक व्यापक धार्मिक पुनरुत्थान के रूप में मनाया जा रहा है, वह बारीकी से निरीक्षण करने पर एक वैष्णव वर्चस्व का सुनियोजित उदय है। राम के नाम पर मैं हालही में अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर के दर्शन करके लौटी हूँ और मेरे लिए यह दौरा जगाने वाला था। मैंने महसूस किया कि अक्सर अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन को केवल एक सामाजिक-राजनीतिक या सांप्रदायिक विवाद के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन जब मैंने राममंदिर परिसर में जाकर वहां की वास्तुकला और प्रतीकों को करीब से देखा तो महसूस हुआ कि इस मंदिर को केवल भगवान राम की जन्मस्थली मात्र नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से "वैष्णव संप्रदाय की सर्वोच्चता" (Vaishnav Supremacy) को स्थापित करने का एक ठोस ज़रिया बनाय...