कुछ तो लोग कहेंगे
अ गस्त की उमस भरी दोपहरों में कीचड़ वाली गलियों में मकान तलाशते हुए बार-बार आयशा को लगता कि बंटवारे के वक्त भी ऐसी ही उमस भरी गर्मी में लोग अपना घर-बार छोड़ कैसे अंजान देस की तरफ चल दिए होंगे पैदल ही। कितने ही मकान देखे थे आयशा और अबरार ने मिलकर, कोई दड़बानुमा घुप्प अंधेरी कोठरी जैसा तो कोई मकानमालिक के सर्वेंट क्वार्टर जैसा। एक भी मकान मन-माफिक नहीं मिला था अभी तक और अब तो हौसला भी टूटने लगा था। मगर बरसाती की टपकती छत के नीचे कैसे बाकि भादों काटते, इसलिए नया घर तो ज़रूरी था। किस्मत से एक मकान दिखाया डीलर ने, जिसमें कदम रखते ही आयशा को लगा कि तलाश यहीं खत्म हुई। बड़ी रोशनीदार खिड़कियाँ, ऊंची छतें, सफेद दीवारें, लंबी बालकनी और लिफ्ट, सब कुछ अपनी जगह सही था। आयशा और अबरार ने इन दूसरे को देखा और बिना कहे ही समझ गए कि किराया बेशक थोड़ा ज़्यादा है, मगर अब तो यहीं रहा जाएगा। और देखते ही देखते दोनों ने इस मकान का कोना-कोना बड़े प्यार से सजाना शुरू किया। अबरार ने किताबों के लिए अलग कमरा रखा, जहां इतिहास, सियासत और कहानियों की नई-पुरानी किताबें बड़ी ही तरतीब से सजाई। उधर आयशा न...