...कि शाहीं बनाता नहीं आशियाना


आज से ठीक 10 साल पहले, 2016 में मैंने फैसला किया कि अब राजधानी दिल्ली में रहूँगी, पढूंगी, काम करुँगी और सबसे बड़ी बात, अपनी खुद की पहचान बनाऊँगी (क्योंकि यहाँ मेरे गाँव-कस्बे में बेटे-बेटी की पहचान उनके मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-ताऊ या जात-बिरादरी से पहले होती है)। उन दिनों कन्हैया का आज़ादी वाला आह्वान न्यूज़ चैनल्स पर ही नहीं, मेरे दिमाग़ में भी चल रहा था। ...पता था, पापा नहीं मानेंगे, मगर फिर भी झोला उठाकर नए शहर चल दी। संयोग से, मेरी दोस्त ऋचा ने मुझे उन्हीं दिनों फ्रीलांस content writer का काम भी दिलाया तो खुदमुख्तारी वाली फीलिंग भी आने लगी। 

कहते हैं दिल्ली मुसाफ़िरों की सराय रही है और मुहाजिरों का ठिकाना भी। मैंने भी एक मुसाफ़िर, एक खोजी की तरह दिल्ली की ख़ाक छाननी शुरू की। हैंडबैग में sony cybershot का कैमरा, एक tourist map, pepper spray और एक किरपाण लेकर कभी तुगलकाबाद किले की चढ़ाई चढ़ी, कभी फ़िरोज़शाह कोटला के किले में भटकी। सोहेल हाशमी सर के साथ heritage walk में महरौली की सैर की, स्वप्ना लिडल मैम के साथ राष्ट्रपति निवास घूमा, दुष्यंत सिंहजी ने CP घुमाया, आसिफ़ अली ने निज़ामुद्दीन का दौरा करवाया। प्रदीप कृष्ण की किताब Trees of Delhi मेरे पास college के समय से थी, लेकिन अब उसे लेकर लोधी गार्डन और संजय वन में दिल्ली के पेड़ों की नस्लें पहचानी। दिल्ली रहते हुए कई दोस्त मेरे मेहमान बने, कोई इटली से आई तो कोई ऑस्ट्रिया से; सबको पर्सनल गाइड की तरह "अपना शहर" घुमाया। संजय कॉलोनी की झुग्गियों में इंटरव्यू किए, लटियंस के बंगलों में बने संग्रहालयों में घूमते हुए सपने देखे, जेएनयू में नाटकों की रिहर्सल का हिस्सा बनी, हैबिटेट सेंटर में कामकाजी मुलाकातें की, मण्डी हाउस इलाके में खूब थिएटर देखा, कितने ही बुक लॉन्च में मौजूद रही, यहीं अपने childhood heroes को मिलकर खुश हुई, फिर निराश भी हुई। गर्मियों में सड़क किनारे झूलते बोगनवेलिया की बहार देखी, बसन्त में पलाश के गिरे हुए फूलों की खूबसूरती। कई तरह के लोगों से राब्ता हुआ, कुछ ने कल्चरल शॉक दिया, तो कुछ ने अपनाइयत। मगर कुछ न कुछ सिखाया सभी ने। कितनी ही अलग-अलग राष्ट्रीयताओं और स्थानीयताओं का जमावड़ा देखने को मिला दिल्ली में। 

लेकिन दिमाग में हमेशा एक माली हिसाब-किताब चलता रहा। अपनी हिफाज़त को लेकर एक सावचेती बनी रही। दिल्ली आते ही नोटबंदी की मुसीबत झेलनी पड़ी थी। नोट बदलवाने के लिए जब धक्के खाते हुए लम्बी कतारों में खड़ा होना पड़ा तो वो शे'र याद आता: 
"अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ, 
..अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ।"

दोस्तों के सहारे ही मैं इस शहर में आई थी मगर धीरे-धीरे सब दिल्ली छोड़ने लगे। हर दिवाली को स्मॉग की वजह से रौनक की जगह मुर्दघाट जैसी उदासी रहने लगी। नॉर्थ दिल्ली में हुए दंगों से मैं वाक़ई काँप गई। फिर आया कोरोना काल। बीमार हुए और ऑक्सीजन के अभाव में लगने लगा कि यार-दोस्त भी अब कुछ मदद न कर पाएँगे। बॉर्डर पर पक्के मोर्चे लगाकर किसान बैठे थे और मैं बिना देर किए दिल्ली से निकलकर अपने घर जाकर जीना/मरना चाहती थी। फिर घर गई तो लगा कि अब न दिल्ली में रुकने की कोई वजह है और न वापिस लौटने का कोई रास्ता। लेकिन फिर भी दिल्ली के साथ मैं एक long distance relationship में बनी रही। 15 दिन घर, 15 दिन दिल्ली। सामन (salmon) मछली की तरह अपने घर की तरफ लौट आई थी मैं। दिल्ली की anonymity छोड़कर वापिस उसी जात-बिरादरी और बाप-दादा की पहचान वाले वतन में।

दिल्ली का कुछ नहीं घटा था मेरी ग़ैर-मौजूदगी से। पूर्व रक्षामंत्री जसवंत सिंहजी ने अपनी किताब 'District Diary' में लिखा था, "Delhi provides an address, but never permanence. No one is indispensable to Delhi; each of us serves a purpose, and once the purpose is served, we give way to others." कई लिहाज़ से दिल्ली ने मुझे निराश किया और एक समय के बाद मैंने मान लिया कि इस शहर में मैंने तो शक्कर की तरह घुलना चाहा मगर इस शहर ने ही मुझे उगल दिया। 

...2026 में आखिरकार दिल्ली छूट ही गया। कहते हैं दिल्ली में दाखिल होने के लिए कई दरवाज़े (gates)हैं मगर दिल्ली से विदा होने के लिए कोई दर नहीं है। फिर भी, भारी दिल से अपनी गृहस्थी को 300+ गत्ते की पेटियों में समेटकर हमने दिल्ली से कूच किया मोहम्मद बिन तुग़लक़ की तरह, अपनी नई राजधानी की तरफ़। घर की दीवारों से लिपटकर अलविदा कहा, दोस्तों को "फिर मिलेंगे" कहा और छोड़ आए हम वो दिल्ली की गलियाँ। 

सच कहूँ तो दिल्ली छूट गया है मगर दिल्ली से मोह अब भी नहीं..! 

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