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युद्धभूमि से खेल के मैदान तक: भारतीय खेलों में राजपूत खिलाड़ियों की ऐतिहासिक विरासत

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भारतीय खेल इतिहास की परतें जब हम खोलते हैं, तो साफ दिखता है कि मैदान पर मिलने वाली कामयाबी सिर्फ शारीरिक दमखम का खेल नहीं है; इसके पीछे जाति, क्षेत्र और सांस्कृतिक परिवेश की एक गहरी भूमिका रही है। इसे समझने के लिए हमें समाज के अलग-अलग ढांचों को देखना होगा। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के मराठी ब्राह्मणों का शुरुआती क्रिकेट की तरफ झुकाव इसलिए था क्योंकि इस खेल की प्रकृति- जैसे शारीरिक संपर्क (body contact) न होना और बहुत ज़्यादा भारी ताकत की जगह तकनीक व रणनीतिक सूझबूझ की ज़रूरत होना, उनके सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के बेहद करीब बैठी। दूसरी तरफ, हरियाणा के जाटों का कुश्ती (Wrestling) में जो आज दबदबा है, वह सीधे तौर पर वहां के देहाती अखाड़ों, खेती-किसानी से जुड़े मजबूत स्टैमिना और ब्रिटिश काल में 'सैन्य श्रम बाजार' (military labor market) का हिस्सा बनने की उनकी देसज पहचान से पैदा हुआ, जहां कुश्ती ही उनके पौरुष और सामाजिक गौरव का जरिया बनी। ठीक इसी सामाजिक और क्षेत्रीय ताने-बाने के बीच राजपूत खिलाड़ियों का खेल इतिहास में उभार अपनी एक बिल्कुल अलग और अनूठी कहानी बया...

राजपूतिकरण के मोहपाश में फंसा बहुजन समाज

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माननीय हाई कोर्ट ने हालही में फैसला दिया कि जातीय भेदभाव से बचने के लिए एक व्यक्ति अपना जातीय उपनाम बदल सकता है या जो मन करे, वह जातीय उपनाम लगा सकता है।  इस फैसले से सबसे पहले तो ' दहाड़' (फिल्म) का वह सीन याद आया जब दलित हवलदार अंजली भाटी (सोनाक्षी सिन्हा) अपने पिता द्वारा अपनाया हुआ 'भाटी' उपनाम त्यागकर स्वाभिमान से अपना असली उपनाम (मेघवाल) अपनाती है।  लेकिन इसी टेंडेंसी को टटोलते हुए हमें मिलते हैं एक्टर सुशांत सिंह (जाट), जिन्होंने पत्रकार सुमित चौहान (दलित पत्रकार, जो खुद भी क्षत्रिय कुल CHAUHAN उपनाम लगाते हैं) को दिए एक ताज़ा इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने अपना नाम सुशांत कुमार से सुशांत सिंह बदल लिया था क्योंकि उन्हें सुशांत 'सिंह' में ज़्यादा 'वज़न' लगता था।  रवीश की रिपोर्ट का एक पुराना एपिसोड देख रही थी जिसमें रवीश जी और सर्वप्रिया उत्तरप्रदेश के एक कुर्मी बहुल गांव में चुनावी जायज़ा लेने जाते हैं और गांववाले उन्हें बताते हैं कि वे कुर्मी हैं लेकिन 'सिंह' उपनाम लगाते हैं।   ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की ...

पौराणिकता के मायाजाल में उलझे महाराणा प्रताप

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निर्मित धारणाओं और छवि चमकाने वाली पीआर फैक्ट्रियों के समय में , यह आम बात है कि इंसानों को ' अतिमानव ' बना दिया जाता है और सत्य की जगह   पोस्ट ट्रुथ ले लेता   है। इतिहास का तोड़ा - मरोड़ा जाना , अतिशयोक्ति या दुष्प्रचार करना इस वैश्विक प्रवृत्ति में कोई नई बात नहीं है।   इतिहास में पहले भी हल्के बदलाव के साथ प्राच्यवादी नज़र ( ओरिएंटलिस्ट गेज़ ) ने इस तरकीब का इस्तेमाल उस लेंस को बदलने के लिए किया था , जिससे दुनिया पूर्व को देखती थी। इसी तर्ज़ पर   शीत युद्ध के दौर में सिनेमा ने कुछ समुदायों को बदनाम करने या विशिष्ट विचारधाराओं को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रचार उपकरण के रूप में काम किया। ऐसे ही   अफ्रीकी और एशियाई इतिहास , साहित्य और संस्कृति के ' आंग्लीकरण ' ने एशियाई और अफ्रीकी मूल के लोगों के लिए उनकी अपनी पहचान को ही पराया बना दिया गया।   मध्यकालीन मेवाड़ के शासक , महाराणा प्रताप का मामला भी कुछ ऐसा ही है , जिनकी छवि को क...