Posts

The Red Thread

Image
She soaked her feet in the holy river and rubbed the slippery stones underneath the water with her toes. The sunrays penetrated deep down the waters and the sounds of hymns from the ashrams penetrated deep down her soul at the same time. For quite long, she kept looking at the red thread tied on her wrist. It was moist, losing color but still clutching her wrist tightly within the knots, which the temple priest had tied. Again and again, this thread appeared like her marriage, which had dampened with time and had lost its essence but was still clutching her existence because the society has tied it so tight to her life. For years, she had been living in the empty-shell marriage where she had been mindlessly laboring for the sake of a societal compulsion.  Exhausted with the weight of her own thoughts, she tried to look elsewhere. A group of people were rowing a boat in the river. They appeared extremely audacious to her at first, for they had dared to venture into the dee...

Chasing Shadows

Image
  He was sure that it was her...almost!  He walked briskly down the pavement, overtaking several fellow pedestrians.  She wore a white top and a flowing blue skirt. Her hair flew tantalizingly behind her as it used to all those years ago...when she was merely a part of his imagination, his dreams. And today, as he saw her, he felt as if his imagination has worn a clout of reality and stepped right out of his thoughts. He stepped closer; she was observing photographs displayed in the open air exhibition among many others but his eyes stared at her in disbelief and déjà vu. And miraculously, his sight stirred her attention towards him and their eyes met. Those two strangers gazed into each other's eyes for minutes as the world around them moved at its own pace, as if their eyes were trying to open few entangled knots of their past. And then, the boy accompanying her shook her shoulder and walked her away. He was still gazing at her departing image without saying a...

झील, किनारे और गहराई

Image
शिकारा जब झील की ख़ामोशी को छेड़ता था, झील एक धुन की तरह बज उठती थी--और हमें बहाती हुई इस किनारे से उस किनारे तक ले जाती थी।  इस झील का पानी जेहलम से आता है ! जेहलम ज़ख़्मी थी , उसके किनारे बाशिंदों ने छल्ली कर दिए थे ! हर किनारे पर बेहिसाब बेशुमार बस्तियां , बस्तियों के लोग अपना मटमैला कल झील में फेंक देते हैं , जो आज और आने वाले कल तक झील की खामोश सतह पर बेशर्मी  तैरता है ! किसी को झील की ख़ामोशी में दिलचस्पी नहीं थी ! किसी को तस्वीर उतारनी थी, किसी को सामान बेचना था , किसी को नयी सवारी लानी थी ! झील बेशक मजबूर है , कहीं बह कर जा नहीं सकती ; पर कोई नहीं जानता की बेचारी झील गहरा रही है ! उसके किनारे चाहे आज उसके नहीं , मगर उसकी गहराई अब तक उसी की है ! चुपचाप अपनी हरी ख़ामोशी के नीचे वह एक कब्र खोदती है , उनके लिए जो तस्वीर खींचने या सामान बेचने-खरीदने नहीं आते ! उनके लिए जो डूबने आते हैं खामोश नज़ारों में ! 

साहिल, लहर और सागर के नाम ...

Image
  साहिल और लहर की मोहब्बत तो अरसों और बरसों से थी ! लहर सारा दिन सफ़ेद लिबास पहने नाचती रहती और साहिल दूर बैठा उसे देखता ! कभी लहर आकर साहिल के चेहरे को पानी के छींटों से भिगो देती और कभी ज़ोर से टकरा कर भाग जाती ! छू -छुआई के इस खेल में साहिल और लहर इस कदर डूबे रहते कि सूरज के चढ़ने-डूबने को भी देखते नहीं थे !  एक दिन किसी बात पर दोनों झगड़ पड़े ! साहिल मर्द था, अपनी जगह से नहीं हिला ! लहर भी गुस्से में आकर साहिल से बारहा जा टकराई ! चाँद इस ज्वार-भाटे का गवाह बनकर सब चुपचाप देखता रहा !  अगली सुबह लहर साहिल से मिलने नहीं आई ! हालाँकि कई लोग शांत लहर और खामोश साहिल को देखने ज़रूर आए ! कई दिन बीते ! साहिल उस ज्वार-भाटे की चोटों से ज़ख़्मी था ! किनारे टूटने लगे थे ! बहने लगे थे ! लोगों ने साहिल पर आना कम कर दिआ ! साहिल वीरान सा बैठा ऊंघता रहता ! अब भी लहर का इंतज़ार करता ! क़तरा-क़तरा बिखरता रहता !  और फिर…… एक रोज़ हवा ने साहिल का एक मज़बूत पेड़ गिरा दिया ! साहिल अब भी कुछ न बोला ! अपने लुटते-गिरते हुए मकानों और पेड़ों से मुँह फेर कर लहर के आने का इंतज़ार करता रहा !  हवा ...

किसान का पसीना

और एक दिन ऐसा आएगा गोदामों में सड़ रहा अनाज  --बारूद बन जाएगा -- खेत अस्ला उपजाएँगे  और MSP के भरोसे आढ़तियों की प्लिंथ पर  धूप में जलता हुआ किसान  अपना पसीना पोंछेगा---  और लावे की तरह बहता हुआ किसान का पसीना-- ---गाँव की पगडंडियों से होकर शहर की गलियों तक आजाएगा   ---अन्नदाता शायद तभी पहचाना जाएगा ---

ईलाज

Image
"फसल कैसी हुई अबकी बार ?" अपनी गद्दीदार पहिये-वाली कुर्सी पर डोलते हुए डॉक्टर गुप्ता  पूछता तो गाँव से आई हुई मरीज़ अपना दर्द और झिझक भुला कर ज़रा सहज हो जाती ! मरीज़ों से बतियाते और चुटकुले सुनाते हुए डॉक्टर गुप्ता इंजेक्शन में दवाई भरता और अपने मोटे-मोटे चश्मों से बाज़ की तरह मरीज़ को ढूंढता !  "डॉक्टर साब ! मैं तो अपनी घरवाली के बुखार की दवाई लेने आया था ! आपने तो 'टीका' भी बना दिया !"  "तुमने पहले नहीं बताया की घरवाली घर पर है ! अब तू ही लगवा ले टीका, बुखार का ही तो है ! कोई बिगाड़ नहीं करता ! और दवाई महंगी आती है, भई ! "  डॉक्टर गुप्ता हँसते-हँसते मरीज़ के पति को ही इंजेक्शन लगवाने के लिए मना लेते और डॉक्टर साहब का रुतबा और मान इलाके में यूँ था की कोई इन्हे मना भी नहीं कर सकता था ! अपनी किरकिराती कुर्सी पर झूलते हुए डॉक्टर गुप्ता आने वाले मरीज़ों से गाँव-शेहेर की पूरी खबर-सार लेता रहता ! दोपहर को क्लिनिक बंद करके घर जाते हुए सब्जीवाले की दुकान से चुन-चुन कर ताज़ी सब्ज़ियाँ-फल लेता और ५-८  किलो का थैला हाथ में उठाये शान से घर जाता ! डॉक्टर गुप्ता ...

फौजी की घर वापसी

Image
जब भी छुट्टी पर फौजी शेर सिंह घर आता, साल भर के राशन से कोठरी भरवा देता ! अपने पहाड़ी गाँव में किसी धाम में जाता तो परोसने वाले बेशक़ थक जाते लेकिन फौजी शेर सिंह का मन खाने से नहीं भरता था ! सुबह अपनी बीवी के साथ जंगल में लकड़ियाँ कटवाने जाता तो उसे कहता, "अरी ऐ लक्ष्मी ! वो गीत तो सुना ज़रा..... जो तू पहले गुनगुनाती थी- 'ओ फौजिया ! आम्ब पके हो घर आ .… ' यह सुनकर उसकी बीवी लकड़ियाँ बाँधते-बटोरते हुए हँसने लगती- "तू फौजी कम, सौदाई  ज़यादा है !" छुट्टी जैसे जैसे ख़त्म होने को आती, काम और बढ़ते जाते ! कच्चे मकान पर खपरैल बदलने से लेकर बेटी का दाखिला कॉलेज में करवाने तक; बूढ़े बाप को P.G.I. में दिखाने से लेकर कबीलदारी निभाने तक- फौजी शेर सिंह एक-एक करके सब काम निपटा अपनी ड्यूटी पर चल देता ! पर रिटायर होने के बाद जब फौजी शेर सिंह गाँव वापिस आया तो पहले जैसी बात न रही ! वो भाभी,जो पहले हर बार कैंटीन से लाया हुआ राशन चौखट से ही थाम लेती थी; इस बार बुलाने पर भी नहीं आयी ! फौजी ने जब अपने खेत में बहाई करने की तैयारी की तो बड़ा भाई भी थोडा तल्ख़ हो गया: "देख शेरा ! तू ...

तीलियाँ

Image
माचिस की डिबिया में दो ही तीलियाँ रह गयी थी ! एक बुझी हुई सरकारी तीली, जिसके चेहरे पर सरकारी रौब था और मन में पेंशन का संतोष ! दूसरी तीली साबुत थी, जलने और जलाने को तैयार; सिर पर ज्वलनशील मसाले के साथ सोचने वाला दिमाग भी था(बेरोज़गार थी शायद) ! दोनों तीलियाँ पीठ से पीठ सटाये अपनी फ्लैट-नुमा माचिस की डिबिया में सुस्ता रही थीं !   बाहर से आवाज़ें आयी ! कोई चिल्ला रहा था शायद ! फिर कमरे की लाइट जली ! साबुत तीली ने सरकारी तीली को उठाया ! सरकारी तीली करवट लेकर सोई रही !  "मैं क्या कर सकती हूँ ! मेरा बारूद जल चुका है ! मैं रिटायर हो गयी हूँ ! सोने भी दे !" साबुत तीली बेचैन होने लगी ! कमरे में आग लग चुकी थी ! सेंक माचिस की डिबिया तक आने लगा ! साबुत तीली से और बर्दाश्त न हुआ ! वो इस जलते हुए कमरे की आग में कूद गयी ! जो आग बुझने ही वाली थी, वो इस तीली से और बढ़ गयी ! सीलन से भरा पूरा कमरा रौशनी और तपिश से जल उठा !  …लेकिन रिटायर्ड सरकारी तीली बेचारी नींद में ही जल कर ख़ाक़ हो गयी !

धुंद

Image
source: google images रस्ते में हाथ दे कर हमारी गाड़ी को रोकते हुए वो कहता, "ले बेटे ! मालपूए बनाये हैं ! लेते जा !"  गर्मियों की शाम को हाथ में थैला उठाये वो आता और कहता, "भिन्डी लाया हूँ ! बिटिया को पसंद है ना !" जब भी हम बाज़ार जाते, उसे घर पर छोड़ जाते और हमारे आने तक वो बरामदे वाली चारपाई पर ही बैठा रहता ! राशन की बोरी सिर पर उठाये वो सुबह उस समय आता, जब हम सो कर उठे भी न होते थे ! पिछले साल हमारे बूगनविलिया की बेल को दराती से काटते हुए उसने कहा था," ऐसे ही फूल-पत्तियाँ लगा कर जगह ख़राब करते हो ! यहाँ ये सब झाड़ियाँ साफ़ करवाकर कनक उगाओ !" उसकी बातें सुनकर उसकी नासमझी पर हमने उसे मन ही मन खूब कोसा था ! बालों में जब से उसने लाल-मेहँदी लगाई थी, उसका नाम मज़ाक-मज़ाक में सबने 'मेहँदी-हसन' रख दिया था ! उसका बेटा बताता है कि उसे लाख समझाया कि बेटी की शादी में सूट सिल्वा ले मगर वो ज़िद पर अड़ गया कि नहीं सिलवाऊंगा ! कहता था कि मैंने मज़दूरी करके कमाई की है ताउम्र; सूट पहनकर मैं सहज नहीं हूँगा ! मगर फिर बेटों के समझाने पर कोट सिल्वा लिया था ! जब पहली बा...

पगला

Image
source: google images हर रविवार की दोपहर वो ज़रूर आता ! गेट से ही 'चाचाजी चाचाजी' पुकारता हुआ वो जैसे ही आता, उसकी चाची खीज कर अपने माथे पर हाथ मारती !  "लो ! आगया अपने चाचे का पगला भतीजा ! छुट्टी वाले दिन भी चैन से नहीं रहने देता ! घर वाले इसको कमरे में बंद करके क्यूँ नहीं रखते !" वो पगला  बड़े हक़ से आकर बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठ जाता  और बिना किसी के पूछे अपना और अपने परिवार का हालचाल सुनाने लगता ! "चाचीजी ! मेरी बेटी अब बाहरवीं में हो गयी है ! उसे पिताजी ने स्कूटी भी दिलवा दी है ! गाँव भर में घूमती है अब !" जब कोई पगले की बात पर ध्यान न देता तो वो खीज कर हर कमरे में झाँकता, ताकि किसी को अपनी बातें सुना सके; पर उसे देखते ही बच्चे कमरे की चिटखनी लगा कर बैठ जाते ! कौन सुने इस पगले की बड़ -बड़ ! सन्डे को तो और कितने काम होते हैं करने को ! एक ही दिन तो होता है हफ्ते में अमरीका वाले मामू से स्काइप पर चैट करने के लिए ! और फिर मैटिनी-मूवी भी तो देखनी होती है स्टार-मूवीज पर ! पगला जाकर चाचाजी के कमरे में बैठ जाता ! "चाचाजी ! आप दवाई तो लेते हैं ना? ...