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वामपंथ और ब्राह्मणों को जोड़ती राजनैतिक गर्भनाल

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हाल ही में, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स के पीएचडी छात्र धनंजय ने जेएनयूएसयू चुनाव में अध्यक्ष पद जीता। बत्ती लाल बैरवा के बाद धनंजय पहले दलित जेएनयूएसयू अध्यक्ष हैं, जिन्होंने 1996 में जीत हासिल की थी । यह हमें स्वाभाविक रूप से आश्चर्यचकित करता है कि समग्रता के नारों से गूंजने वाले जेएनयू के वामपंथी गढ़ में, छात्र संघ में प्रमुख पद को हाशिये पर रहने वाले समुदायों से दूर क्यों रखा गया और अखिल-भारतीय स्तर पर वामपंथी नेतृत्व पर ब्राह्मणों का वर्चस्व क्यों बना रहा है?    भारतीय वामपंथ में ब्राह्मण आधिपत्य भारतीय वामपंथी राजनीति में ब्राह्मण आधिपत्य को उजागर करने के लिए हमें वामपंथ के नेतृत्व, इतिहास और विचारधारा में थोड़ा गहराई से झांकने की जरूरत है।  1944 में लिखे गए एक लेख में, यह देखते हुए कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर ब्राह्मणों का वर्चस्व था, ईवीआर पेरियार ने तर्क दिया कि जब तक जाति मौजूद है, किसी भी प्रकार का साम्यवाद केवल ब्राह्मणों को लाभ पहुंचाएगा , क्योंकि आर्थिक स्थिति में मात्र बदलाव जरूरी नहीं होगा। (2009: 1646) पेरियार की भविष्यवाणी और अधिक स...

सतिप्रथा का ठीकरा और ठाकुर का सिर

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सती प्रथा का ज़िक्र हालही में सोशल मीडिया में फिर सुर्खियों में तब आया जब 2023 में अहमदाबाद की 28 वर्षीय इंजीनियर संगीता लखरा पर उसके ससुराल पक्ष द्वारा पति की मृत्यु उपरांत सती होने का दबाव बनाया गया और ऐसे में मानसिक तनाव में आकर उसने आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद सती प्रथा को फिर से टटोला जाने लगा और घूमफिर कर सोशल मीडिया के स्वघोषित एजेंडाबाज विशेषज्ञों ने सती के बहाने क्षत्रीय समाज को टारगेट करना शुरू किया। इससे पहले सतिप्रथा के जिस केस को सबसे विवादास्पद बनाकर मीडिया ने परोसा था, वह था राजस्थान में 18 वर्षीय रूपकंवर के सती होने का, जिसके तुरंत बाद, राज्य सरकार द्वारा सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 लागू किया गया जिसमें सती का महिमामंडन करने वालों को दंडित करने का प्रावधान था। सनद रहे कि 1829 में, ब्रिटिश भारत के सभी न्यायालयों में सती प्रथा (प्रथा) पर प्रतिबंध लगाने वाला बंगाल सती विनियमन तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिन द्वारा पारित हो चुका था। लेकिन सती प्रथा के बहाने रूपकंवर केस को नज़ीर बनाकर मीडिया के मठाधीशों और बौद्धिक जगत के वडेरों ने जानबूझकर इस कुप...