वैष्णव साम्राज्य का नव उदय


आधुनिक भारत के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक ऐसा सुव्यवस्थित परिवर्तन चल रहा है जिसका उद्देश्य देश के बुनियादी बहुलतावाद को एकाश्मीय आध्यात्मिक व्यवस्था में ढालना है। अयोध्या के नए तराशे गए पत्थरों के पैनलों से लेकर बनारस की बदलती प्रशासनिक नीतियों तक, सनातन धर्म की विविध परंपराओं को लगातार समरूपीकरण किया जा रहा है। वर्तमान में जिसे एक व्यापक धार्मिक पुनरुत्थान के रूप में मनाया जा रहा है, वह बारीकी से निरीक्षण करने पर एक वैष्णव वर्चस्व का सुनियोजित उदय है।

राम के नाम पर

मैं हालही में अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर के दर्शन करके लौटी हूँ और मेरे लिए यह दौरा जगाने वाला था। मैंने महसूस किया कि अक्सर अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन को केवल एक सामाजिक-राजनीतिक या सांप्रदायिक विवाद के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन जब मैंने राममंदिर परिसर में जाकर वहां की वास्तुकला और प्रतीकों को करीब से देखा तो महसूस हुआ कि इस मंदिर को केवल भगवान राम की जन्मस्थली मात्र नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से "वैष्णव संप्रदाय की सर्वोच्चता" (Vaishnav Supremacy) को स्थापित करने का एक ठोस ज़रिया बनाया गया है। 

मंदिर का मुख्य विवरण पैनल ही इस बात की तस्दीक करता है, जिसकी शुरुआत स्पष्ट रूप से "श्री राम, भगवान विष्णु के अवतार..." से होती है। गर्भगृह के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर भगवान विष्णु की शयनमुद्रा (अनंत शयन) की छवि उकेरी गई है, जो मंदिर के सर्वोच्च स्वामी के रूप में विष्णु की उपस्थिति को रेखांकित करती है। आप रामलला को भगवान विष्णु से अलग करके देख ही नहीं पाते। 

इस विचार की सबसे बड़ी गवाही खुद गर्भगृह में विराजमान रामलला की वह विहंगम मूर्ति देती है, जिसे मूर्तिकार अरुण योगीराज ने काले रंग के विशेष पत्थर ('कृष्ण शिला') से तराशा है। यह रंग कोई महज कलात्मक संयोग नहीं है; हमारे शास्त्रों में भगवान विष्णु के विग्रह के लिए विशेष रूप से 'श्यामवर्ण' (गहरे या काले रंग) का वर्णन मिलता है, और चूंकि राम को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया गया है, इसीलिए इसी रंग के पत्थर का चयन किया गया। 

इतना ही नहीं, इस मूर्ति के चारों ओर बने आभामंडल (प्रभावली) पर विष्णु के दसों अवतारों (दशावतार) को बहुत बारीकी से प्रदर्शित किया गया है, जो लगातार देखने वाले का ध्यान श्रीराम से हटाकर बार-बार उनकी विष्णु अवतार की पहचान याद दिलाता है।

यह वैष्णव प्रभाव केवल मंदिर की दीवारों या गर्भगृह तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने पूरे शहर के सार्वजनिक स्थानों को अपने दायरे में ले लिया है। सरयू घाट के आसपास की सड़कों पर लगी स्ट्रीट लाइट्स को अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो उन पर विष्णु के मुख्य प्रतीक चिन्ह (जैसे शंख और चक्र) साफ तौर पर दिखाई देते हैं, जो पूरे क्षेत्र को एक तरह से 'वैष्णव क्षेत्र' के रूप में चिन्हित करते हैं। हालही में अयोध्या प्रशासन ने श्रीराम मंदिर के 15 किलोमीटर के दायरे में मांसाहारी भोजन की डिलीवरी पर भी प्रतिबंध लगा दिया है जो इस नगरी को "शुद्ध वैष्णव" बनाने की ओर अग्रसर एक एहम कदम भी प्रतीत होता है।

इतिहास गवाह है कि सनातन धर्म के भीतर वैष्णव, शैव और शाक्त संप्रदायों के बीच अपनी-अपनी सर्वोच्चता को लेकर सदियों पुराना वैचारिक संघर्ष रहा है। श्री राम भी क्षत्रियों के इक्ष्वाकु कुल के युवराज हुए और कायदे से क्षत्रिय शाक्त परम्परा से जुड़े रहे हैं। कहा जाता है कि श्री राम ने शिव की भी आराधना की। ऐसे में, अयोध्या राम मंदिर के जरिए राम के राजा वाले स्वरूप से कहीं ज्यादा उनके ब्रह्मांडीय विष्णु स्वरूप पर जोर देना यह दिखाता है कि इस आधुनिक धार्मिक प्रतीक के केंद्र में चुपचाप वैष्णव पदानुक्रम को सबसे ऊपर स्थापित किया जा रहा है।


माता वैष्णो देवी का वैष्णवीकरण

यदि इतिहास की परतों को राजनीतिक चश्मे से हटाकर देखा जाए, तो जम्मू के डोगरा (सूर्यवंशी जमवाल) राजपूतों के इतिहास और कटरा की त्रिकूट पहाड़ियों में बसी 'त्रिकूट देवी' की कहानी में एक गहरा सांस्कृतिक बदलाव (Cultural Appropriation) नजर आता है। मूल रूप से, यह पावन गुफा जमवाल राजपूतों की कुलदेवी का स्थान थी, जहाँ सदियों से राजपूताना परंपरा के अनुसार उग्र, स्वतंत्र और प्रकृति से जुड़ी 'शाक्त' (शक्ति की पूजा) परंपरा के तहत देवी की आराधना होती थी। राजपूत संस्कृति में कुलदेवी शक्ति, युद्ध और संप्रभुता का प्रतीक होती थीं, जिनका सीधा संबंध रक्त, संहार और रक्षण से था। लेकिन जैसे-जैसे इस क्षेत्र पर मुख्यधारा के वैष्णव मत का प्रभाव और सामाजिक-धार्मिक नियंत्रण बढ़ा, इस प्राचीन आदिवासी और राजपूताना शाक्त पीठ का बड़ी चतुराई से 'वैष्णवीकरण' कर दिया गया।

इस वैष्णव वर्चस्व (Vaishnav Supremacy) को स्थापित करने के लिए देवी के मूल स्वरूप को बदलकर उन्हें 'सात्विक' घोषित किया गया। इसके पीछे पौराणिक कथाओं का हवाला दिया गया, जिसमें देवी मां खुद भगवान विष्णु की अनन्य भक्त हैं और उनकी प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही हैं। यह कथा सीधे तौर पर एक स्वतंत्र, सर्वोच्च और युद्धप्रिय शाक्त देवी को भगवान विष्णु के अधीन लाकर खड़ा कर देती है। इस वैचारिक हेरफेर के जरिए राजपूतों की उस मूल और उग्र शक्ति-पूजा की परंपरा को पूरी तरह से हल्का (dilute) कर दिया गया, जो उनके क्षत्रिय धर्म का मूल आधार थी। 

यहाँ तक कि जब १९वीं सदी में महाराजा गुलाब सिंह ने इस क्षेत्र पर अपना साम्राज्य मजबूत किया और 'धर्मार्थ ट्रस्ट' की स्थापना की, तब तक इस स्थान का सांस्कृतिक ढांचा पूरी तरह बदला जा चुका था। बाद में, महाराजा हरि सिंह और डॉ. कर्ण सिंह के दौर तक आते-आते यह पूरी तरह एक सात्विक वैष्णव तीर्थ बन गया। यह बदलाव साफ दिखाता है कि धार्मिक इतिहास में किस तरह स्थानीय राजपूत और शाक्त पहचान को दबाकर वैष्णव संप्रदाय ने अपनी सर्वोच्चता की कहानी को पत्थरों और लोक-चेतना पर लिख दिया।

बनारस में सात्विक एकरसता का नया प्रयोग

हालही में वाराणसी नगर निगम द्वारा शहर की सीमा के भीतर मांस, मछली और मुर्गे की सभी दुकानों पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें बाहर खदेड़ने का फैसला महज एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अयोध्या से शुरू हुए 'वैष्णव वर्चस्व' (Vaishnav Supremacy) के उस व्यापक सांस्कृतिक नैरेटिव का हिस्सा है, जो अब काशी की रगों में जबरन घोला जा रहा है। 

सदियों से बनारस का चरित्र शैव (Shiva-centric) और शाक्त (Tantric) परंपराओं से तय होता रहा है, जहाँ श्मशान के कापालिक से लेकर देवालय तक, बिना किसी भेद-भाव के हर रस को समाहित किया गया। यह वही बनारस है जहाँ अघोराचार्य बाबा कीनाराम के क्रीं-कुंड में 'मछली-भात' का महाप्रसाद बंटता है, कमच्छा के बटुक भैरव पर बकरे का भोग लगता है और हर शनिवार को काल भैरव मंदिर में शहर के संभ्रांत वर्ग द्वारा मदिरा की बोतलें चढ़ाई जाती हैं। लेकिन 'नव्य काशी' के नाम पर अब इस प्राचीन तंत्र-भूमि के बहुआयामी चरित्र को दबाकर उस पर एक खास किस्म की 'सात्विक-वैष्णव' जीवनशैली थोपी जा रही है। मांसाहार को 'धर्म-विरोधी' या 'अपवित्र' घोषित करने की यह नई समझ वास्तव में बनारस के निर्माण में अग्रणी रहे क्षत्रियों और अन्य मूल शाक्त समूहों की सांस्कृतिक विरासत के साथ सीधे तौर पर नाइंसाफी है।

यह पूरी कवायद असल में बनारस की विद्रोही और स्वतंत्र 'शैव पहचान' को हल्का (dilute) करके उसे एक अनुशासित, आज्ञाकारी और एकरस (homogenized) "वैष्णव ढांचे में ढालने" का प्रयास है। सनातन धर्म की असली ताकत उसकी बहुलता थी; जहाँ एक तरफ पूर्ण शाकाहारी वैष्णव थे, तो दूसरी तरफ मद्य-मांस को प्रसाद मानने वाले परम पूजनीय शाक्त और अघोरी भी थे। लेकिन आज जिस तरह से राज्य की शक्ति का इस्तेमाल करके केवल एक ही 'सात्विक' परिभाषा को अंतिम सत्य माना जा रहा है, वह हिंदू धर्म को उसकी मूल बहुलता से दूर ले जाकर जैन धर्म जैसी निरामिषता की तरफ धकेलने जैसा है। 

राम के खान-पान पर विमर्श

हाल के वर्षों में भगवान राम के खान-पान की आदतों को लेकर छिड़ा विवाद महज एक धार्मिक बहस नहीं है, बल्कि यह राम को एक स्वतंत्र क्षत्रिय राजा के स्वरूप से बेदखल कर उन्हें पूरी तरह एक 'वैष्णव अवतार' के सात्विक सांचे में ढालने (Appropriation) की एक और सोची-समझी कोशिश है। प्राचीन धर्मग्रंथों, विशेषकर वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट रूप से दोनों ही दृष्टिकोण मिलते हैं जहाँ अयोध्या कांड के कई श्लोक दिखाते हैं कि एक क्षत्रिय होने के नाते अपने क्षात्र-धर्म का पालन करते हुए राम ने हिरण का शिकार किया और मांस का सेवन किया। वहीं दूसरी ओर, वनवास के दौरान कई प्रसंग ऐसे भी हैं जहाँ वे और माता सीता 14 वर्षों तक केवल कंद-मूल, फल और वनस्पतियों का सेवन करते हैं। 

असल में, राम का खान-पान किसी एक निश्चित या रूढ़िवादी परिभाषा में बंधा हुआ नहीं था, बल्कि वह पूरी तरह से 'परिस्थिति-जन्य धर्म' (Situational Dharma) पर आधारित था। वे वनवास से पहले और आपातकालीन स्थितियों में एक योद्धा की तरह मांसाहार भी करते थे और आध्यात्मिक व्रतों या वन के शांत वातावरण में स्वेच्छा से पूर्ण शाकाहार का पालन भी करते थे। हिंदू धर्म की मूल भावना भी यही रही है जहाँ मांसाहार पूरी तरह वर्जित नहीं था, बल्कि परिस्थितियों, जातिगत कर्तव्यों और आध्यात्मिक लक्ष्यों के अनुसार आहार में लचीलापन था।

इसके बावजूद, आज की मुख्यधारा की राजनीति और धार्मिक विमर्श द्वारा राम को 'परम शाकाहारी' सिद्ध करने की जो जिद पकड़ी गई है, वह सीधे तौर पर उस वैष्णव वर्चस्व (Vaishnav Supremacy) को मजबूत करती है जो सनातन की अन्य सभी विविधताओं को निगल जाना चाहती है। राम को एक शुद्ध सात्विक शाकाहारी के रूप में प्रस्तुत करना, उनके उस ऐतिहासिक व प्रामाणिक क्षात्र-स्वरूप को दबा देता है जिसमें शिकार, बलि और बल की प्रधानता थी। यह नैरेटिव जानबूझकर इसलिए बुना जा रहा है ताकि राम की पहचान को उनके मानवीय और स्थानीय राजा के रूप से ऊपर उठाकर सीधे तौर पर विष्णु के उस ब्रह्मांडीय सात्विक अवतार से जोड़ दिया जाए, जहाँ केवल वैष्णव नियम ही सर्वोपरि हैं।

बंगाल की थाली का वैष्णवीकरण 

पश्चिम बंगाल में हाल ही में शुरू की गई एक नीतिगत पहल राज्य की कल्याणकारी व्यवस्थाओं में वैष्णव संस्थाओं के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद कोलकाता के विद्यालयों में एक पायलट परियोजना के तहत मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना का संचालन कथित रूप से इस्कॉन की अक्षय पात्र फाउंडेशन को सौंप दिया गया। इसके तहत स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने वाले भोजन की जगह सात्त्विक शाकाहारी भोजन परोसा जाने लगा, जिसमें केवल मांस और मछली ही नहीं, बल्कि प्याज, लहसुन और अंडे भी शामिल नहीं हैं।

जहाँ समर्थक इस कदम को भोजन की गुणवत्ता और प्रशासनिक दक्षता में सुधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वहीं आलोचकों का मानना है कि यह उस समाज पर एक विशिष्ट वैष्णव आहार-संहिता को सांस्कृतिक रूप से थोपने का प्रयास है, जिसकी पाक परंपराएँ ऐतिहासिक रूप से मछली और अन्य मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर आधारित रही हैं। ऐसे राज्य में, जहाँ शाकाहार आज भी अल्पसंख्यक जीवन-शैली है, इस परिवर्तन ने यह चिंता पैदा कर दी है कि कहीं कल्याणकारी सुधारों के नाम पर सार्वजनिक संस्थाएँ वैष्णव धार्मिक मूल्यों के सामान्यीकरण का माध्यम तो नहीं बन रही हैं।

यह विवाद एक व्यापक बहस को भी उजागर करता है: क्या शिक्षा, खाद्य वितरण और सार्वजनिक नीति के क्षेत्रों में वैष्णव संगठनों का बढ़ता विस्तार केवल सामाजिक सेवा का रूप है, या फिर यह क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचानों के क्रमिक पुनर्गठन की एक सूक्ष्म प्रक्रिया का हिस्सा है।

गांधी का वैष्णववाद

भारतीय जनमानस की चेतना में वैष्णव मत को लाने और उसे एक सर्वव्यापी नैतिक स्वीकार्यता देने में महात्मा गांधी की भूमिका को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। गांधीजी स्वयं एक वैष्णव परिवार से आते थे, जिसका जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि 'गांधी परिवार वैष्णव था और मेरे माता-पिता विशेष रूप से कट्टर वैष्णव थे।' यहाँ तक कि जब भी उनसे उनके धर्म के बारे में पूछा जाता था, तो वे गर्व से कहते थे, "वैष्णव!"।

महात्मा गांधी ने 15वीं सदी के प्रसिद्ध गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता द्वारा रचित अपने प्रिय भजन "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीड़ पराई जाणे रे" को अपने पूरे जीवन और स्वाधीनता आंदोलन का मूल मंत्र बना दिया। गांधी ने पारंपरिक वैष्णववाद को जैन धर्म के 'अहिंसा' जैसे सिद्धांतों के साथ मिलाकर उसका कायाकल्प कर दिया। जब गांधीजी ने कहा, "मैं दिल से एक वैष्णव हूँ और मैं वैसा ही बनने का प्रयास कर रहा हूँ जैसा संत नरसैया (नरसिंह मेहता) ने परिभाषित किया है," तो उन्होंने असल में एकरस और सात्विक वैष्णव चेतना को आम भारतीय के लिए 'आदर्श मानवीय आचरण' का पैमाना बना दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश के कोने-कोने में इस भजन की गूंज ने अनजाने में ही सही, लेकिन भारतीय समाज के अवचेतन मन पर वैष्णव आचार-संहिता को राष्ट्रवाद की आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित कर दिया। इस प्रकार, गांधीजी केवल राजनीति नहीं कर रहे थे; वे अपनी गहरी वैष्णव जड़ों और नैतिक आग्रहों के जरिए समूचे भारत को एक सात्विक, करुणा-आधारित और वैष्णववादी ढांचे की ओर मोड़ रहे थे, जिसने आगे चलकर आधुनिक भारत की नई सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को तय करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

वैष्णव वर्चस्व का सांस्कृतिक सूक्ष्मान्वेषण 

भारत के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य पर आज जो 'सात्विक-वैष्णववाद' का वर्चस्व दिखाई दे रहा है, वह रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे सदियों पुराना एक ऐसा सूक्ष्म और गहरा सांस्कृतिक प्रोपेगैंडा काम कर रहा है, जिसने बहुत ही सुगमता से समाज के अवचेतन मन को पूरी तरह 'विष्णुमय' कर दिया है। 

इस वर्चस्व की नींव चैतन्य महाप्रभु द्वारा शुरू की गई गौड़ीय वैष्णव परंपरा में निहित है, जिसने कृष्ण को पहले विष्णु अवतार माना। इसी विचार को आधुनिक युग में ISKCON जैसे वैश्विक संगठनों ने दुनिया भर में फैलाकर सात्विकता को हिंदू धर्म की एकमात्र वैश्विक पहचान बना दिया। 

आज के दौर में प्रेमानंद जी महाराज जैसे प्रभावशाली और लोकप्रिय संतों के उभार ने, जो माथे पर विशिष्ट वैष्णव तिलक और गले में तुलसी की कंठी माला धारण करते हैं, इस नैरेटिव को आम युवाओं और घरों तक पहुंचा दिया है। इसके साथ ही, राजनीतिक मंचों से देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा प्रयोग किए जाने वाले अभिवादन और नारे, जैसे 'राधे-राधे', 'हरि बोल' और 'जय जगन्नाथ', इस बात का ज्वलंत प्रमाण हैं कि कैसे वैष्णव प्रतीकों को 'सॉफ्ट प्रोपेगैंडा' के जरिए आधुनिक राष्ट्रवाद की आधिकारिक भाषा बना दिया गया है।

इस वैष्णव वर्चस्व की सबसे चतुर रणनीति रही है दूसरों को अपने भीतर समाहित कर लेना। इसका सबसे सटीक उदाहरण भागवत पुराण में मिलता है, जहाँ विष्णु के २४ अवतारों की सूची में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (ऋषभदेव) को भी विष्णु का अवतार घोषित कर दिया गया। यह अन्य स्वतंत्र धार्मिक और शाक्त दर्शनों की विशिष्टता को सोखने (Dilute करने) का एक प्राचीन और अचूक तरीका रहा है। जब गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि "मैं हिंदू वैष्णव हूँ, जैन नहीं," तो उन्होंने अनजाने में इसी ऐतिहासिक सत्य को उजागर किया कि कैसे जैन धर्म की 'अहिंसा और सात्विकता' के मूल सिद्धांतों को वैष्णववाद ने अपने भीतर इस तरह समाहित कर लिया है कि आज दोनों की व्यावहारिक सीमाएं धुंधली हो चुकी हैं। 

मणिपुर के संघर्ष में 'वैष्णववाद' की पृष्ठभूमि 

वैष्णव वर्चस्व की एक बेहद सूक्ष्म और गहरी परत मणिपुर की त्रासदी में भी नजर आती है। मई 2023 से मणिपुर में जारी भीषण हिंसा को अक्सर केवल मैतेई (Meitei) और कुकी-ज़ो (Kuki-Zo) समुदायों के बीच भूमि अधिकारों, अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रशासनिक विवाद के रूप में देखा जाता है। लेकिन क्या इतना भर इस संघर्ष को समझने के लिए पर्याप्त है? 

इतिहास गवाह है कि 18वीं शताब्दी में राजा पामहेबा के शासनकाल में जब वैष्णव धर्म को राजकीय संरक्षण मिला, तो इसने मणिपुर के सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल दिया। आज इम्फाल घाटी के बहुसंख्यक मैतेई समाज (~53% आबादी) की मुख्यधारा की सांस्कृतिक पहचान इसी हिंदू वैष्णव परंपरा से तय होती है, जिसका जीवंत रूप हमें 1832 से शुरू हुई ऐतिहासिक 'कांग' (जगन्नाथ रथ यात्रा) उत्सव में दिखता है। इसके विपरीत, पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश कुकी-ज़ो समुदाय ईसाई धर्म का पालन करते हैं। हालाँकि मैतेई समाज के भीतर सनामही (मूल आदिवासी आस्था), इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वाले लोग भी मौजूद हैं, लेकिन राज्य की शक्ति और नैरेटिव पर हमेशा से इसी सात्विक-वैष्णव मैतेई पहचान का ही दबदबा रहा है।

यही कारण है कि कई शोधकर्ताओं और विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संघर्ष केवल ज़मीनी लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके भीतर ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रभुत्व से जुड़े गहरे प्रश्न मौजूद हैं। माना जा रहा है कि वैष्णव मैतेई अस्मिता को ही राज्य की प्राथमिक और वैध पहचान मानकर अन्य सभी क्षेत्रीय, जनजातीय और धार्मिक अस्मिताओं को इस वर्चस्व के सामने गौण कर दिया गया है। धार्मिक पहचान भले ही इस संघर्ष का एकमात्र कारण न हो, लेकिन इसने समुदायों के बीच अविश्वास और ध्रुवीकरण को निश्चित रूप से और गहरा किया है। यह संघर्ष इतिहास, भूगोल, जातीय पहचान और उस सूक्ष्म 'वैष्णव पदानुक्रम' की कई परतों से मिलकर बना है, जो खुद को अन्य सभी स्थानीय अस्मिताओं से श्रेष्ठ और प्राथमिक मानता है।

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद का अवसान 

यदि समग्रता से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक भारत के धार्मिक और राजनीतिक पटल पर जिसे 'सनातन का पुनरुत्थान' कहा जा रहा है, वह वास्तव में वैष्णव वर्चस्व को सर्वोपरि स्थापित करने की एक बेहद सूक्ष्म, सुव्यवस्थित और दीर्घकालिक वैचारिक परियोजना है। सनातन धर्म की वास्तविक शक्ति और जीवंतता उसकी उस अनंत बहुलता में थी, जहाँ शाक्तों की बलि, शैवों का अघोर, क्षत्रियों का क्षात्र-धर्म और वैष्णवों की सात्विकता एक साथ सह-अस्तित्व में थे। लेकिन आज अन्य सभी स्वतंत्र और विद्रोही दर्शनों को अपने भीतर समाहित या विलोपित करके पूरे देश पर जो एकरस, अनुशासित और रूढ़िवादी वैष्णव पदानुक्रम थोपा जा रहा है, वह हिंदू धर्म को उसकी मूल बहुआयामी आत्मा से दूर ले जाकर एक संकीर्ण और राजनीतिक सांचे में ढालने जैसा है। पत्थरों से लेकर सड़कों तक और खान-पान से लेकर युद्ध की विभीषिका तक, यह बदलता हुआ भारत असल में एक विविधतापूर्ण संस्कृति से एकरस 'वैष्णव साम्राज्य' बनने की ओर अग्रसर है।


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