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पर्दे के आगे और पर्दे के पीछे: धर्मेंद्र के सिनेमाई नैरेटिव का विश्लेषण

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भारतीय सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम नहीं; यह एक ऐसा दर्पण भी है जो समाज की छवि बनाता और कभी-कभी बदल भी देता है। कलाकार अपनी संवेदनाओं, निजी अनुभवों और सामाजिक संबंधों के आधार पर पात्र चुनते हैं, कहानियाँ बताते हैं और अनजाने में ही कई बार किसी समुदाय के बारे में स्थायी धारणा गढ़ देते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में धर्मेंद्र का सिनेमा, विशेषकर राजस्थान और उससे जुड़े पात्रों का चित्रण, एक चिंतन का विषय अवश्य बनता है। 1977 की एक मुलाकात जिसने बहुत कुछ बदल दिया साल 1977 में धर्मेंद्र जयपुर आए। यहीं उनकी मुलाकात प्रतिष्ठित उद्योगपति और राजनीतिक परिवार से जुड़े विजय पूनिया से हुई। यह मुलाकात धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदली; इतनी गहरी कि धर्मेंद्र ने पूनिया की बेटी के विवाह में कन्यादान भी किया।  2003 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में उन्होंने ऊषा पूनिया के लिए प्रचार किया, और 2004 में बीकानेर से चुनाव लड़ने के लिए वसुंधरा राजे द्वारा उन्हें पूनिया के माध्यम से मनाने की सफल कोशिश भी हुई। वर्षों बाद, अंतरराष्ट्रीय जाट संसद 2020 के मंच से विजय पूनिया ने स्वयं ...